विश्व पर्यावरण दिवस : उत्सव नहीं, मानव अस्तित्व का प्रश्न

Zeeupdate rajsthan News| Dalip nokhwal

— डॉ. गीतांजलि राठौड़

हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक औपचारिक आयोजन या प्रतीकात्मक उत्सव नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का स्मरण कराने का महत्वपूर्ण अवसर है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण, जल संकट, वनों की कटाई और जैव विविधता के क्षरण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब इस दिवस का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।

पृथ्वी का पर्यावरणीय संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल स्तर चिंताजनक गति से नीचे जा रहा है, जंगल सिकुड़ रहे हैं और वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है। अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, भीषण गर्मी तथा प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति स्पष्ट संकेत हैं कि प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है। यदि समय रहते हमने अपनी जीवनशैली और विकास के तौर-तरीकों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे।

अक्सर पर्यावरणीय संकट के लिए केवल सरकारों, उद्योगों या नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि आम नागरिक भी इसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हैं। प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग, पानी और बिजली की बर्बादी, पेड़ों की कटाई के प्रति उदासीनता तथा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने स्थिति को और गंभीर बनाया है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हम पर्यावरणीय संकट को धीरे-धीरे सामान्य मानने लगे हैं। जब तक समस्या सीधे हमारे जीवन को प्रभावित नहीं करती, तब तक हम उसे केवल समाचार समझते हैं, चेतावनी नहीं। यही सामाजिक उदासीनता आज पर्यावरण संरक्षण की राह में सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है।

आज विकास और सुविधाओं की अंधी दौड़ में प्रकृति का निरंतर दोहन किया जा रहा है। पेड़ों की जगह कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं, जल स्रोत सिमट रहे हैं और स्वच्छ हवा दुर्लभ होती जा रही है। यदि समाज इस विनाश के प्रति मौन बना रहता है, तो यह मौन केवल निष्क्रियता नहीं, बल्कि भविष्य के संकटों में अप्रत्यक्ष सहभागिता भी है।

विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह संदेश देता है कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा होना चाहिए। जल संरक्षण, ऊर्जा की बचत, प्लास्टिक के उपयोग में कमी, वृक्षारोपण, स्वच्छता और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।

इस दिशा में शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि बचपन से ही पर्यावरणीय चेतना और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जाए, तो एक जिम्मेदार और जागरूक समाज का निर्माण संभव है।

आज आवश्यकता केवल भाषणों, नारों और औपचारिक अभियानों की नहीं, बल्कि व्यवहारिक परिवर्तन की है। पर्यावरण संरक्षण को व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्व के रूप में स्वीकार करना समय की सबसे बड़ी मांग है। क्योंकि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी मानव जीवन सुरक्षित रहेगा।

विश्व पर्यावरण दिवस हमें एक साथ चेतावनी भी देता है और अवसर भी। चेतावनी इस बात की कि प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है, और अवसर इस संकल्प का कि हम मिलकर अपनी धरती को सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं।

महात्मा गांधी का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है— “प्रकृति प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक के लालच को नहीं।”

आइए, इस विश्व पर्यावरण दिवस पर हम केवल पौधारोपण तक सीमित न रहें, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का संकल्प लें। क्योंकि धरती को बचाना केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है।

— डॉ. गीतांजलि राठौड़
शिक्षाविद्, विचारक, चिंतक एवं लेखिका
प्राचार्या, जगदम्बा पी.जी. कॉलेज, खाजूवाला (बीकानेर)